राजद्रोह

क्यों लगा पत्रकार विनोद दुआ पर राजद्रोह का आरोप?

भारत राजनीति

राजद्रोह (sedition) के मामले कुछ सालो में बहुत बढ गया है और आये दिन पत्रकारो के ऊपर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज हो रहे है। अभी कुछ ही दिन पहले पत्रकार विनोद दुआ के ऊपर राजद्रोह (sedition) का मामला सामने आया है। दरअसर बीजेपी के एक नेता ने पत्रकार विनोद दुआ के एक शो को लेकर उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। लेकिन उनकी यह अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर कहा कि साल 1962 का आदेश हर पत्रकार को इस तरह से आरोपो से बचाव करता है।

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क्यों हुआ पत्रकार दुआ पर राजद्रोह (sedition) का केस?

पत्रकार विनोद दुआ ने अपने यूट्यूब चैनल के एक शो द विनोद दुआ शो में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विवादित बाते कही थी जिस पर बीजेपी के नेता श्याम ने पत्रकार दुआ के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। बीजेपी के नेता के अनुसार पत्रकार ने प्रधानमंत्री मोदी के ऊपर वोट पाने के और आतंकी हमले शब्द का उपयोग करने का इलजाम लगाया है। श्याम ने बताया कि दुआ ने अपने शो में विवादित टिप्पणी की जो कि सम्प्रदायिक दंगो को बढावा दे सकता है जिससे अशांति की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। बीजेपी के नेता श्याम ने पत्रकार दुआ पर विवादित कंटेन्ट प्रकाशित करने, झुठी खबरे फैलाने और लोगो को भङकाने का आरोप भी दर्ज कराया था। अपने बचाव के लिए पत्रकार दुआ ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजा खटखटाया और याचिका में अपने खिलाफ दर्ज हुए FIR को रद्द करने की बात की। इसके अलावा दुआ ने अन्य पत्रकार के खिलाफ हुए राजद्रोह के मामले पर एक कमेटी के निमार्ण की भी बात कही।

लेकिन 3 जून को सुप्रीम कोर्ट ने दुआ के खिलाफ लगे मामलो को खारिज कर दिया और बताया की केदारनाथ सिंह के फैसले के अनुसार हर एक पत्रकार सुरक्षा का हकदार है जिसमें धारा 124A में राजद्रोह के अपराध का वर्णन किया गया है।

 

क्या है धारा 124 A?

धारा 124 A राजद्रोह (sedition) को परिभाषित करता है, इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति लिखित तौर पर या अपने शब्दो के जरिए या फिर सांकेतिक शब्दो या किसी अन्य तरीके से घृणा या दंगा या अवमानना को फैलाने का प्रयास करता है या फिर सरकार के खिलाफ असंतोष को भङकाने की कोशिश करता है तो उसे राजद्रोह (sedition) का आरोपी माना जाता है। यह एक गैर जमानती आरोप है जिसमें आरोपी को कम से कम तीन साल से लेकर आजीवन काल तक जेल हो सकती है और जुर्माना भी लग सकता है।

 

क्या है केदारनाथ सिंह फैसला

साल 1962 मे सुप्रीम कोर्ट में केदारनाथ सिंह vs state of Bihar वाले केस में एक अहम फैसला सुनाया था जिसमे फेडरल कोर्ट ऑफ इंडिया ने भी अपना सहमति जतायी थी। इसमें कहा गया था कि केवल सरकार या एडमिनिस्ट्रेशन पर कमेंट या फिर आलोचना के आधार पर राजद्रोह का केस नही बनाया जा सकता है। दरअसल 1962 में बिहार के रहने वाले केदारनाथ सिंह पर एक भाषण को लेकर राज्य सरकार ने राजद्रोह का मामला दर्ज करवाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी और यह बताया कि देशद्रोही भाषाणों एवं व्यक्ति को तभी सजा दी जा सकती है जब उसकी वजह से किसी तरह का हिंसा, दंगा या फिर सामाजिक असंतुष्तिकरण बढ रही हो, केवल सरकार पर कमेंट या टिप्पणी करने से राजद्रोह का केस नही बनता है। राजद्रोह का मामला तभी दर्ज हो सकता है जब हिंसा भङकाने का प्रयास हो रहा हो केवल नारेबाजी से राजद्रोह का ममला दर्ज नही किया जा सकता है।

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अब तक कितने पत्रकारो पर राजद्रोह (sedition) के मामले दर्ज हुए है

साल 2021 के शुरूआत के महीने में ही कांग्रेस सांसद और 6 पत्रकारो के ऊपर राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ था। इन पर सोशल मीडिया द्वारा और दिल्ली में किसानो की ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया गया था। इतना ही नही पिछले साल 2020 में केरल के एक पत्रकार कप्पन पर भी राजद्रोह का आरोप लगा था। दरअसल उन पर यह आरोप तब लगा था जब वह बलात्कार मामले की रिपोर्ट के लिए हाथरस जा रहे थे। इनके अलावा भी कई पत्रकारो पर राजद्रोह मामले दर्ज हुए है। साल 2020 में ही मणिपुर के एक पत्रकार के ऊपर सोशल मीडिया पोस्ट के वजह से राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था।

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